बुधवार, 8 अक्टूबर 2008

हे राम

विजय दशमी की सभी मित्रों और देशवासियों को बधाई.



हे राम!
एक बार फिर अवतार लो
इस बार तुम्हे एक नहीं,
अनेक रावणों का संहार करना होगा
रावण, जो दिल्ली से कंधमाल
उडीसा से असम तक फैले हैं
अयोध्या और गुजरात
में भी इन्होने तांडव मचाया है
कभी ईश्वर और कभी अल्लाह के नाम पर
हवा में नफरतों का ज़हर घोला है
ये रावण से भी अधिक क्रूर हैं
बलात्कारी और कातिल हैं
इन्हें क्षमा मत करना.
हे राम
एक बार फिर धरती पर आ
इन रावणों से धरती को मुक्ति दिला.............

मंगलवार, 30 सितंबर 2008

ईद और नवरात्र की बधाई

ईद १ या २ तारीख को है. मैं घर जा रहा हूँ जो एक गाँव में है. सभी दोस्तों से ईद के बाद ही वार्तालाप होगा. इसलिए सभी को................
ईद और नवरात्र की मुबारकबाद.
साथ ही सभी से इल्तिजा है कि त्योहारों के इस पवन अवसर पर दुआ करें कि देश में आपसी सोहार्द और भाईचारा कायम रहे. अनेक हो कर भी हम एक रहें........................... आमीन

बुधवार, 24 सितंबर 2008

बयार बन कर

(इन दिनों आतंकवादी घटनाएँ लगातार बढती जा रही हैं. देश के बड़े-बड़े शहर उनके निशाने पर हैं. दिल्ली में भी उन्होंने कहर बरपा किया. इसी कारण मन बेहद क्षुब्द रहा. नेट पर जाने या ब्लॉग खोलने का मन भी नहीं किया. लेकिन ज़ख्मों को भुलाना ही पड़ता है. और दोस्तों की महफिल हमेशा मरहम का काम देती है, सो फिर आपकी महफिल में आ पहुंचा हूँ.
खैर.......... इस बार फिर अपनी पत्रकार मित्र सुनीता सैनी की कविता से रु-ब-रु करा रहा हूँ. वही सुनीता जो पिछली बार चिडिया बन कर उड़ जाना चाह रही थीं, इस बार देखिये क्या बनने की चाहत रखती हैं.............. जाकिर )



बयार बन कर
मैं बहना चाहूं
गाँव की महकती मिटटी में
रहना चाहूं
फूलों के संग खेलूँ
कलियों से बतियाऊं
लहराते खेतों सा लहराऊं
बादलों में मैं उड़ जाऊँ
नदियों का संग ले लूं
सरसों से रंग ले लूं
बहते-बहते
तुम्हारे घर आँगन जा पहुंचू
सोया हो जब तू खेतों में
लहराते-सरसराते हुए
चुपके से तुझको छु लूं
मस्त-मगन इस मौसम में
मतवाली बयार बन मैं घूमूं

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

नए ज़माने की लड़की

(परिवर्तन जीवन का नियम हैं. चाहे हम किसी परिवर्तन के खिलाफ हों या उसके तरफदार. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. बदलाव चलते रहते हैं. ये ही प्रकृति का नियम है, ये ही जीवन की गति. ऐसे ही एक परिवर्तन को कलमबंद किया है मैंने. उसकी अच्छाई-बुराई हमारी अपनी सोचों पर निर्भर करती है...... जाकिर)

पहली बार
किसी लड़के से
अकेले में मिलने पर
अब उस सोलह साला लड़की का
दिल नहीं धड़कता
न अब उसकी पलकें भारी होती हैं
न चेहरा शर्म से गुलनार
न अब वो मुस्कुराके
अंगुली पर दुपट्टा लपेटती है
न नज़रें नीची किये
अंगूठे से ज़मीन कुरेदती है
शब्द भी
अब उसके गले में नहीं अटकते
वह नए ज़माने कि लड़की है
नए ढंग से प्यार करती है

सोमवार, 1 सितंबर 2008

अभिलाषा

एक अभिलाषा
स्वप्नों की भाषा
मैं भी पढूं, तुम भी पढो
लम्बा सफ़र हो
लक्ष्य पर नज़र हो
नयनों के भौन में
शब्दों के मौन में
मिलने की चाह लिए
हंसी या आह लिए
फूलों की बांह में
काँटों की राह में
मैं भी बढूँ, तुम भी बढो
बुलंदी की आस में
ऊँचे आकाश में
पंखों की थिरकन
फिर वही भटकन
मंजिल की चाह लिए
धूप या छांह लिए
दुर्गम डगर पर
ऊँचे शिखर पर
मैं भी चढूं, तुम भी चढो
दूर बियाबान में
कहीं सुनसान में
सोचों को संग लिए
मलिनता के रंग लिए
बैठ चुपचाप में
कहीं अपने-आप में
शाम- सवेरे
बिम्ब तेरे, मेरे
मैं भी गढूं, तुम भी गढो

बुधवार, 20 अगस्त 2008

वो लड़की

वो लड़की, वो पागल दीवानी-सी लड़की
वो किस्सों में लिपटी कहानी-सी लड़की
वो खेतों में चढ़ती दुपहरी का साया
वो शामों की अल्हड जवानी-सी लड़की
गोबर, पसीने की खुशबू से लथ-पथ
वो पनघट के गीतों की रानी-सी लड़की
मेरी खातिर मौसम की तरह बदलती
वो बर्फ, वो आग, वो पानी-सी लड़की
तालों में खिलती हुई एक कँवल-सी
वो नदियों-सी बहती तूफानी-सी लड़की
अंधेरों में जुगनू की मानिंद चमकती
जमीं पर उतरती आसमानी-सी लड़की
'जवाहर' नक्श आज तक है ज़हन पर
वो ज़ख्मों की हल्की निशानी-सी लड़की

रविवार, 10 अगस्त 2008

छोटी सी आशा


इस बार प्रस्तुत है एक पत्रकार मित्र सुनीता सैनी की कविता.
दिल्ली में जन्मी और पली-बढ़ी सुनीता उस वर्ग से आती हैं, जहां संघर्ष ज्यादा और प्राप्ति कम होती है. जहाँ रस्ते बने बनाये नहीं मिलते बल्कि बनाने पड़ते हैं. और अपने लिए रास्ते बनाने के संघर्षों ने ही उन्हें दूसरो से अलग बनाया है. इस से उन्हें एक नयी उर्जा मिली है कुछ अलग करने की.
दिल्ली के एक हिंदी दैनिक में पत्रकार सुनीता की कविताएँ पूरी तरह व्यक्तिगत होते हुए भी कई बार बरबस ही अभिभूत कर जाती हैं................. जाकिर हुसैन.




काश!
मैं कोई चिडिया होती
जहाँ-तहां मैं उड़ती फिरती
कभी धरती
कभी आकाश
मन चाही उडान मैं भरती
कभी होती मैं अपने पास
और कभी तुम्हारे पास
तुमसे बतियाती
तुम्हारे आँगन में इठलाती
कभी होती तुम्हारे घर की दीवारों पर
कभी तुम्हारी खिड़की चौबारों पर
टेबल पर तुम्हारी होती
और कभी किताबों पर
कोई मजबूरी
या बंदिश की डोरी
तब फिर मुझे बांध न पाती
मन चाहता तो साया बनकर
हर पल संग तुम्हारे आती
तुम्हारा घर आँगन होता
मेरा घर आँगन
तुम्हारा जीवन होता मेरा जीवन
मैं तुझमें ही जीती रहती
काश!
मैं कोई चिडिया होती