खैर.......... इस बार फिर अपनी पत्रकार मित्र सुनीता सैनी की कविता से रु-ब-रु करा रहा हूँ. वही सुनीता जो पिछली बार चिडिया बन कर उड़ जाना चाह रही थीं, इस बार देखिये क्या बनने की चाहत रखती हैं.............. जाकिर )


बयार बन कर
मैं बहना चाहूं
गाँव की महकती मिटटी में
रहना चाहूं
फूलों के संग खेलूँ
कलियों से बतियाऊं
लहराते खेतों सा लहराऊं
बादलों में मैं उड़ जाऊँ
नदियों का संग ले लूं
सरसों से रंग ले लूं
बहते-बहते
तुम्हारे घर आँगन जा पहुंचू
सोया हो जब तू खेतों में
लहराते-सरसराते हुए
चुपके से तुझको छु लूं
मस्त-मगन इस मौसम में
मतवाली बयार बन मैं घूमूं