बुधवार, 28 जनवरी 2009

आवारा मन



जबकि
दिन
अपनी आँखें बंद कर चला
अंधेरे चार सूँ निकल पड़े हैं
जबकि
सभी
नर्म बिस्तर की पलकों में
हसीं ख़्वाबों से लिपटे पड़े हैं
जबकि
शौरोगुल
खामोशियों की आगोश में
बेखबर सोये पड़े हैं
जबकि
चाँद
आसमानी नदी में बहने लगा है
सितारे खिलखिला पड़े हैं
तब
आवारा परिंदा-सा भटकता है मन
आवारा खलाओ में, आवारा उम्मीदें लिए.....

8 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

बहुत खूब इस आवारा मन के मालिक कबीले तारीफ हैं ....


अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

श्रद्धा जैन ने कहा…

Man waqayi aawara hai
kya chhaiye nahi pata

bahut alag bahut achha bahut gahra

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

आवारा परिंदा-सा भटकता है मन
आवारा खलाओ में,आवारा उम्मीदें लिए
बहुत खूब बढ़िया रचना.

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर.
धन्यवाद

makrand ने कहा…

bahut sunder rachana

Jimmy ने कहा…

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Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) ने कहा…

आवारा परिंदा-सा भटकता है मन
आवारा खलाओ में, आवारा उम्मीदें लिए.....

मन की भावनाओं का दिलकश बयां। मुबारकबाद कुबूल फरमाऍं।

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

बहुत खूब।

पर काफी समय से नयी रचनाओं की प्रतीक्षा है।