रविवार, 2 नवंबर 2008

कभी-कभी



कभी-कभी मन करता मेरा
दूर कहीं पर एक जंगल हो,
नदिया हो या साफ़ झील हो
गर्मी के लम्बे-लम्बे दिन,
संडे की हो तेज दुपहरी
चिडियों की चह-चह, मह-मह में
फूलों की भीनी खुशबू में
ठंडी-ठंडी हवा के झोंके,
झील किनारे, पेड़ के नीचे
बैठे हों केवल मैं और तुम
लेकर दुनिया भर की बातें.

कभी-कभी मन करता मेरा......

10 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

चिडियों की चह-चह, मह-मह में
फूलों की भीनी खुशबू में
ठंडी-ठंडी हवा के झोंके,
झील किनारे, पेड़ के नीचे
बैठे हों केवल मैं और तुम
लेकर दुनिया भर की बातें.


ओर थम जाये वक़्त भी अपने पाँव रोककर ....बहुत अच्छा लिखा दोस्त

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

कभी-कभी मन करता मेरा
दूर कहीं पर एक जंगल हो,
नदिया हो या साफ़ झील हो
गर्मी के लम्बे-लम्बे दिन,


बहुत सुंदर भाव हैं...

Mired Mirage ने कहा…

सुन्दर !
घुघूती बासूती

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बहुत प्यारी रचना लिखी है आपने

मीत ने कहा…

Bahut sundar. So simple and so beautiful.

seema gupta ने कहा…

ठंडी-ठंडी हवा के झोंके,
झील किनारे, पेड़ के नीचे
बैठे हों केवल मैं और तुम
लेकर दुनिया भर की बातें.
ek pyaee see masumm see chahet, beautifull..

Regards

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आपने अपने नहीं सब के दिल की बात लिख दी है अपनी रचना में...वाह..
नीरज

राज भाटिय़ा ने कहा…

भाई अगली मई मै हमारे यहां आ जायो सच मै आप की इस सुंद कविता की तरह से सुंदर झील मै दिखा दुगां ओर आप दिल भर कर सुंदर सुंदर कविताये लिखना.
धन्यवाद सुंदर कविता केलिये.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात-दिन...

shahroz ने कहा…

bahut khoob!